चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत 2083 आज से शुरू, 19 मार्च 2026

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हम सभी भारतीय अपना नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि को मनाते हैं, इसी दिन सृष्टि का हुआ था प्रारम्भ और जाने क्यों है यह तिथि हमारा नववर्ष? इसे विक्रम संवत क्यों कहते हैं? और विक्रम संवत से पहले कौन सा संवत था?

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अंग्रेजी दिनांक 19 मार्च 2026 गुरुवार को हमारा नववर्ष प्रारंभ हुआ है इसी दिन से सृष्टि का निर्माण ब्रम्हा ने किया था और इसी दिन युधिष्ठिर ने महाभारत के बाद राज्याभिषेक हुआ था,

भगवान विष्णु के अवतार

  • मत्स्य अवतार: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने प्रलय के दौरान वेदों की रक्षा और सृष्टि को बचाने के लिए इसी दिन ‘मत्स्य अवतार’ लिया था।
  • मर्यादा पुरुषोत्तम राम: माना जाता है कि इसी दिन भगवान राम का राज्याभिषेक (Coronation) अयोध्या में हुआ था, जो अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक था।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

  • महाराज युधिष्ठिर का राज्याभिषेक: महाभारत काल के बाद, इसी दिन युधिष्ठिर का राज्याभिषेक हुआ और ‘युधिष्ठिर संवत’ का प्रारंभ माना गया।
  • वरुण अवतार (झूलेलाल): सिंधी समुदाय इस दिन को भगवान झूलेलाल के अवतरण दिवस यानी ‘चेटीचंड’ के रूप में मनाता है।
  • स्वामी दयानंद सरस्वती: आधुनिक भारत में, इसी दिन स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की थी।

विभिन्न क्षेत्रों में नाम

यह दिन भारत के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न नामों से जाना जाता है:

  • गुड़ी पड़वा: महाराष्ट्र और गोवा।
  • उगादि: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक।
  • नवरेह: कश्मीर।

विक्रम संवत इसका नाम क्यों पड़ा ? और विक्रम संवत से पूर्व कौन सा संवत था ?

हम जहां कहीं भी इस नववर्ष की शुभकामना संदेश देखते हैं वहाँ विक्रम संवत भी लिखा रहता है वह संवत क्या है ? और इस भारतीय वर्ष को विक्रम संवत क्यों कहा जाता है ? आइये जाने-

संवत शब्द या इसे संवत्सर कहा जाता है इसका सीधा अर्थ है वर्ष या साल जिसे संस्कृत मे संवत या संवत्सर कहा जाता है। आधुनिक भाषा मे इसे आप कैलेंडर भी कह सकते हैं और इसके आगे हम विक्रम शब्द इसलिए लगाते हैं क्योंकि इस कैलेंडर या संवत को प्रारंभ करने वाले सम्राट विक्रमादित्य थे, इसी दिन उनका राज्याभिसेक किया गया था और उन्ही के राज्याभिषेक के बाद उस तिथि से इसे विक्रम संवत कहा जाने लगा। हालांकि संवत या नववर्ष प्रारभ होने की तिथि को उन्हों ने नहीं चुना बल्कि ये तो ब्रम्हा पुराण के अनुसार पहले से नियत तिथि है नववर्ष की लेकिन इस नव वर्ष को विक्रम संवत का नाम उसी दिन से कहा जाने लगा , आज से 2082 वर्ष पहले विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ था ये उनके राज्याभिषेक का 2083वां वर्ष होगा इसलिए विक्रम संवत 2083 लिखा हुआ मिलेगा।

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विक्रम संवत से पूर्व कौन सा संवत प्रचलन मे था ?

हमारा सनातन धर्म कुल व्यतीत समय: लगभग 1 अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 127 वर्ष (1,97,29,49,127 वर्ष) पुराना है और तब से आज तक यही हमारा नव वर्ष है लेकिन विक्रम संवत तो 2083 वर्ष मात्र हुआ है तो उस से पूर्वा किस संवत से काल की गणना होती थी? तो इसका उत्तर है की विक्रमादित्य से पूर्व धर्मराज युधिष्टिर के नाम से संवत चलता था, और वह भी इसी तिथि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्रारम्भ होता था इसी प्रकार समय समय पर जो भी परम तेजस्वी सम्राट या राजा हुए उन्होने अपने नाम से संवत चलाया लेकिन संवत प्रारम्भ की तिथि मे किसी ने कोई बदलाव नहीं किया सभी का नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही प्रारम्भ हुआ।

जाने कैसे होती है हमारी काल की गणना ?

चतुर्युगी व्यवस्था

सनातन धर्म में समय को चक्रों में मापा जाता है। एक ‘चतुर्युगी’ की कुल अवधि 43,20,000 वर्ष होती है: | युग | अवधि (वर्ष) | | :— | :— | | सतयुग | 17,28,000 | | त्रेतायुग | 12,96,000 | | द्वापरयुग | 8,64,000 | | कलियुग | 4,32,000 |

इस प्रकार इन चारों युगों को मिलाकर 4320000 वर्ष हुए ये 71 बार बीतते हैं तो एक मन्वंतर होता है फिर 14 मन्वंतर बीतने पर ब्रम्हा का एक दिन होता है और इतने ही दिनों की रात होती है दिन मे सृष्टि होती है और रात मे प्रलय होती है। और इस प्रकार काल गणना के अनुसार ब्रम्हा की आयु दिव्य 100 वर्ष है और अभी ब्रम्हा 52 वर्ष के ऊपर होकर 53 वें वर्ष मे हैं और ब्रम्हा की आयु ही सनातन धर्म के आयु की गणना है अर्थात कुल व्यतीत समय: लगभग 1 अरब 97 करोड़ 29 लाख 49 हजार 127 वर्ष (1,97,29,49,127 वर्ष)।

नव वर्ष के दिन क्या करें ?

इस नव वर्ष मे प्रातः उठकर अपने इष्ट देव कुल देव एवं गुरु की पुजा करें अपने घर मे एक भगवा ध्वज लगाएँ, और अपने समीप के मंदिर मे जाकर भगवान का पूजन करें

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